सौभाग्य से प्रगतिशील लेखक संघ की एक गोष्ठी में जाने का मौका मिला। नामवर सिंह की अध्यक्षता वाली इस गोष्ठी में हिंदी साहित्य के कईं विद्वान मौजूद थे। गोष्ठी संभवतः साहित्य में स्त्री मुक्ति विषय पर थी। अध्यक्षीय भाषण के बाद जुहैर रिजवी ने धन्यवाद ज्ञापन में कईं बातों के साथ एक पहले से स्थापित बात का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा - औरत इस कायनात की सबसे खूबसूरत जीच है। राजकिशोर भी - स्त्रीत्व का उत्सव÷ लिखने की श्रुआत कुछ ऐसे करते हैं -पृथ्वी की सुंदरतम सृष्टि स्त्री है। ...और भी असंख्य बार ये जुमला सुनने को मिलता रहता है। लेकिन पता नहीं क्यों ये सुनकर मैं रीझ नहीं पाती, कि मैं उस औरत जात से हूं जो कि पृथ्वी की सुंदरतम चीज या सृष्टि है। असल में यह एक ऐसा षड़यंत्र है जो स्त्रीत्व के वैभव की आड़ में उसकी देह के वैभव की स्थापना करता
यदि स्त्री के अर्थ को देह तक सीमित न किया जाता, तो उसे पृथ्वी की सुंदरतम सृष्टि न कहा जाता। यह स्त्री देह ही है जिसके चलते पुरुषों ने उसे यह ख़िताब दिया है। यह निपट देह (दिमाग नहीं), ही तो है जो पुरुष को जिंदगी भर उत्तेजित करती और उत्तेजना को शांत करती जाती है। यदि यह (देह के खेल का) ÷अनवरत सिलसिला÷ स्त्री से न जुड़ा होता, तो अपने असली रुप में वह सृष्टि की सुंदरतम चीज नहीं लगती.....! तब सबसे सुंदर चीज बच्चा भी लग सकती थी, लिंग, जाति, धर्म, वर्ण, नस्ल के तमाम भेदों से परे। आखिर सौंदर्य का यह बोध हर बार और बार-बार पुरुषों को ही क्यों होता है ? ज्यादातर किसी औरत के मुह से सुनने में नहीं आता कि ÷हम सृष्टि की सबसे सुंदर चीज हैं÷। हालांकि अभी तो स्त्रियों को सुना जाना बाकि है। सहस्त्रों सालों से तो पुरुषसत्ता ही बोलती आ रही है, अभी तो उन्हीं का मसाला खत्म नहीं हुआ।
हम जानती हैं कि सृष्टि की तरह सृजन कर सकने की क्षमता ने हमें सुंदरतम नहीं कहलवाया है....क्योंकि कम से कम अभी तक तो उस सृजन में पुरुष की भी अहम भूमिका है ही। (हालांकि विज्ञान ने पुरुष की इस भूमिका को भी चुनौती दे दी है !) स्त्री का अन्नपूर्णा रुप भी उसे सुंदरतम नहीं कहला सकता, क्योंकि सबसे बड़े जीवनदायक तो नदी, पेड़-पौधे, हवा-पानी, सूरज आदि हैैं....लेकिन ये सब सिर्फ जीवनदायक हैं....कामनापूर्ति सिर्फ स्त्री के पहलू में ही होती है (कामनापूर्ति के अन्य आधुनिक वैकल्पिक स्रोतों के बावजूद बड़ा सच यही है।)....और इतने आधुनिक तो शायद हम कभी नहीं हो पाएंगे कि देह से तटस्थ होकर सिर्फ दिमाग के कारण ही स्त्री को सुंदर कह दें। असल में स्त्री को ÷सुंदरतम÷ कहलवाने के पीछे पुरुष की उस ÷उत्तेजना का सबसे बड़ा हाथ है जो अपने चरम क्षणों में उसे मोक्ष/मुक्ति/अपार शांति की अनुभूति देती है ! वर्ना इतनी बड़ी कायनात में एक स्त्री की क्या औकात है ? जैसे समाज ने स्त्री को बनाया है (स्वैच्छिक रुप में गढ़ा है), वैसे ही मुझे लगता है कि पुरुष को भी गढ़ा गया है। अपने नैसर्गिक रुप में शायद पुरुष भी ÷उपनिवेशवादी प्रवृत्ति÷ का और इतना कामुक न हो। संभवतः ये अनंत उच्चश्रृंखलता उसे प्रकृति से नहीं सामाजिक विरासत से मिली हो। क्योंकि जिस भी पुरुष ने समाज की चली आ रही तथाकथित विरासत, संस्कार और तर्कविहीन मूल्यों का विरोध किया है, उन पुरुषों की (स्त्रियों के बारे में) सोच और व्यवहार उपनिवेशवादी नहीं बच पाया है।....बावजूद इसके कि वे भी इसी सड़े-गले समाज में पले-बड़े हैं। जो महाबौद्धिक, महाज्ञानी, रचनात्मक, विवेकवान पुरुष स्त्री को सृष्टि की सुंदरतम रचना कहते हैं, उन्हें लगे हाथ अपनी स्त्री पक्षधरता झाड़ते हुए दूसरों पर यह आरोप नहीं लगाना चाहिए कि ÷स्त्री का अर्थ दैहिक सौंदर्य और कोमल वाणी तक ही सीमित कर दिया गया है÷। क्यांेंकि असल में सृष्टि की सुंदरतम रचना स्त्री को कहने के पीछे भी असल में स्त्री के दैहिक सौंदर्य की अटूट उपासना का ही भाव है ....आखिर स्त्री का अर्थ देह और कोमलता गढ़ा किसने है ? कम से कम हम स्त्रियों ने तो नहीं ही गढ़ा। इस अपार वैभवशाली सृष्टि से सुंदर कोई चीज है भला ? असल में स्त्री को सिर्फ देह कहने-समझने वालों से ज्यादा हमें उन बौद्धिक षड़यंत्रकारियों से सावधान रहने की जरुरत है, जो एक तरफ तो स्त्री को सिर्फ देह कहने-समझने वालों पर गुर्राते हैं, दूसरी तरफ सुंदरतम चीज के नाम पर उसे मनचाहा गढ़ते, रचते, वर्णित करते हैं। ये बौद्धिक खुद चाहे लाख उस ÷सुंदरतम÷ के बखान में पूरा साहित्य लिख दें, चित्रकारी कर दें, लेकिन औरत को सीधें-सीधे सिर्फ देह कहने-समझने वालों पर आपत्ति दर्ज करते हैं। हम स्त्रियों को भी बजाए इस लुभावने कांप्लिमेंट पर रीझने के, इस ÷बुश प्रवृत्ति÷ के प्रति सचेत होना चाहिए। वही बुश प्रवृत्ति जो खुद को तो असंख्य परमाणु बम बनाकर श्रेष्ठ घोषित करती है, लेकिन दूसरे के एक भी परमाणु बम बनाने या रखने पर हाय-तौबा करती है। हमें यह समझना जरुरी है कि हमारी देह के प्र्रति अनंत आसक्ति ने ही उन लोगों के मुह से हमें सुंदरतम कहलवाया है। पूरी सृष्टि में स्त्री सुंदरतम कैसे हो सकती है और किन चीजों की तुलना में........? तुलना तो दो भिन्न परिस्थितियों में पले-बढ़ स्त्री-पुरुषों या बच्चों की भी नहीं हो सकती.....। स्त्रियों को सिर्फ देह समझने पर खोखली आपत्ति दर्ज करने वाले ये बौद्धिक षडयंत्रकारी कैसे भूल जाते हैं कि इसी सुंदरतम कृति के सौंदर्य वर्णन में उन्होंने हर जगह सिर्फ उन्नत वक्ष, पतली कमर, और विशाल नितंबों का ही वर्णन और चित्रण किया है....फिर चाहे वह हमारा साहित्य हो, चित्रकला हो या मंदिरों और गुफाओं में बनाई गई मूूर्तिकला ! स्त्री मूर्तियों के चेहरे और खोपरे में इतनी मिट्टी, पत्थर, गारा, सीमेंट कभी नहीं भरा गया, जितना कि उनके अगले-पिछले उभारों में ! स्त्रियों के रेखांकित चित्रों या वर्णित साहित्य में भी सिर और चेहरे में रंग या कलम की स्याही उतनी खर्च नहीं की गई जितनी के उसके उभारों को दर्शाने में....! यही है ना हमारे सुुंदरतम होने का सारा राज.......! ÷सुंदरतम÷ का यह सौंदर्यशास्त्र नवयुवतियों को ज+हन में रखकर गढ़ा गया होगा, चालीस-पचास पार की स्त्रियां तो उस फ्र्रेम से बाहर ही होंगी। हमने बस में देखा है कि किसी बच्चे वाली या जरुरतमंद महिला के लिए कोई लड़का सीट आसानी से नहीं छोड़ता/छोड़ना चाहता। लेकिन किसी नवयुवती का बगल में खड़े रहना उसी लड़के को बेहद अखरता है और वह बिना मांगे भी सीट देने को लालायित रहता है। जिस दुनिया और समाज के पुरुषों को अपनी हर बात, सारे निर्णय सबसे ज्यादा सही, साहसी और सृजनशील लगते हैं, उन पुरुषों की औकात अभी इतनी नहीं है कि वे स्त्री को उसके ÷स्त्रीत्व के वैभव÷ के कारण सुंदरतम की पदवी दे सकें ! वह असल में ÷देह का वैभव÷ है जो हमें सुंदरतम कहलवाता है न कि हमारे ÷स्त्रीत्व का वैभव÷। और इस देह के वैभव का उत्सव भी पुरुषों ने ही मनाया है अभी तक हम स्त्रियों ने नहीं ! हमने तो बाज+ार के आक्रामक रुप में प्रकट होने के बाद जाना कि स्त्रियां भी अपनी देह का वैभव मना सकती हैं। स्त्रीत्व के वैभव में तो उसकी तमाम बौद्धिक, शारीरिक कुशलताएं, हुनर, प्रबंधन, सुजनशीलता(जो कि सिर्फ मॉं बनना नहीं है), ममत्व, स्नेह, ताकत और भी न जाने कितना कुछ आता है। पितृसत्ता के चंगुल से जो निकल चुके हैं, उन पुरुषों को नहीं कहती, लेकिन पितृसत्ता की चाशनी में पोर-पोर डूबे पुरुषों में अभी इतनी हिम्मत नहीं है कि वे इन तमाम गुणों के चलते स्त्री को पूरी कायनात में किसी मामले में सबसे ऊपर, पुरुषों से भी ऊपर रख सकें और उसे सुंदर कह सकें। स्त्री को सुंदरतम कहने वाले क्या बताएंगे कि खुरदुरे हाथों, मजबूत कंधों, बलिष्ठ भुजाओं, फटी ऐडियों वाली सांवली-सलौनी किसानिने और मजदूरिनें भी क्या कभी उनके सौंदर्यशास्त्र में शामिल हुई हैं...? और हुई हैं तो कितनी बार.....? क्या हम स्त्रियों का श्रम, दिमाग, प्रबंधन, ताकत हमें सुंदरतम कहलवाने में सच में शामिल है ? श्रेष्ठ कवयित्री निर्मला पुतुल कि कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं -
÷÷वे दबे पांव आते हैं तुम्हारी संस्कृति में वे तुम्हारे नृत्य की बड़ाई करते हैंवे तुम्हारी आखों की प्रशंसा में कसीदे पढ़ते है, वे कौन हैं......?सौदागर हैं वे....समझो...पहचानांें उन्हें बिटिया मुर्मू.....पहचानो...÷÷
लेखिका जे.एन.यू. में शोधार्थी एवं स्वतत्र टिप्पणीकार हैं।
कमरा न० १०, साबरमती हास्टलजे.एन.यू., नई दिल्ली।९३५००१९५९५
Tuesday, June 9, 2009
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