आलोचक-लेखक विजयमोहन सिंह का एक रोचक आलेख पढ़ने को मिला। अमेरिकी लोगों और समाज का चित्र बड़ी सहज भाषा में इस लेख में उकेरा गया था। इसी में एक जगह अमेरिका के मशहूर शहर लॉस वेगाास का जिक्र आया था जो कि दुनिया भर में अपने जुआघरों के लिए मशहूर है । लॉस वेगाास से जुड़े एक प्रसंग को उन्होंने इस लेख में दर्ज किया है। मैं उस पूरे पैरे को कोट करने से खुद को रोक नहीं पा रहीं हॅ -...कुछ बाद में पता चला कि अनेक सेवानिवृत्त पिता, पुत्रों से विशेष अनुरोध करके लॉस वेगास जरूर जाते हैं और वहां से विभोर और कृत-कृत होकर लौटते हैं। मेरे बेटे ने बताया कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के ऐसे ही एक पिताश्री को उनके श्रवण कुमार लॉस वेगास घुमाकर लाए तो उन्होंने भारत लौटकर अपने हमउम्र रिश्तेदारों से कहा : भाईसाहब स्वर्ग अगर कहीं है तो वहीं है, अब क्या बताएं आप से, प्रायः निर्वस्त्र बालाएं ठुमकती हुई आकर सुरापान कराती हैं और गाल-वाल थपथपा जाती हैं। कुछ धर्मग्रंथों में स्वर्ग के बारे में भी यही सब लिखा है न तो स्वर्ग और क्या होगा?
इस पैरे को पढ़कर काफी देर तक पिताश्री का स्वर्ग मेरे जहन में घूमता रहा... कितना अच्छा हुआ कि एक भारतीय पिता की स्वर्ग संबंधी कल्पना मुझे/हमें इतनी सहजता से पढ़ने को मिली। जाहिर है अपवादी पिता (पुरुष) इस स्वर्ग से दूर ही रहते हैं और मैं उनकी बात भी नहीं कर रही। मैं विश्वास से कह सकती हॅ कि इन पिता को सड़क या पार्क में एक-दूसरे का हाथ पकड़ चलते या चूमते हुए युवक-युवतियां हमेशा ही से नागवार गुजरे होंगे। हर बार उन्होंने इस सबके लिए उसी पश्चिमी सभ्यता को देषी ठहराया होगा और गाली भी दी होगी, जहां उन्होंने जन्नत देखी। खैर, ये हमारे दादाओं, पिताओं, पतियों, दोस्तों, भाइयों और बेटों की जन्नत है। जिसके बारे में या तो अक्सर खुलकर स्वीकारा नहीं जाता या फिर पुरुषों की महफिलों में ही इस जन्नत का जिक्र छिड़ता होगा। जो लोग लॉस वेगास जाना अफोर्ड नहीं कर सकते वे पोर्न साइट, एम.एम.एस, पोर्न फिल्मों और थोड़ा बहुत रेड लाइट एरिया के कोठों पर इस जन्नत का एक झरोखा ले पाते हैं। तकनीक ने इस जन्नत को पुरुषों के लिए बेहद सस्ता, सुलभ और टिकाऊ बनाया है। हमारी फिल्में, विज्ञापन, पोस्टर, अखबार, और पत्रिकाएं हर पल, हर क्षण पूरे समाज के माहौल को स्वर्गमय बनाने में जुटे हुए हैं। और काफी हद तक वे अपनी इस मेहनत में सफल भी हो रहे हैं। हर तरफ निर्वस्त्र या लगभग निर्वस्त्र बालाएं समय, बाजार और (पितृसत्ता की भी) मांग के मुताबिक इस देश-दुनया को स्वर्गमय बनाने में अपना कीमती सहयोग दे रही हैं।
कोई माने या न माने लेकिन इस स्वर्गानुभूति के कारण ही हमें (स्त्री को) दुनिया की, कायनात की सबसे खूबसूरत चीज कहा और प्रचारित किया जाता है। हमारा मातृत्व, हमारी रचनात्मकता, हमारा प्रबंधन, हमारा दिन-रात का अद्श्य श्रम हमें सुंदरतम कहलवाने में शामिल नहीं है।
लेकिन पुरुषों के लिए इस स्वर्ग को रचने में हम स्त्रियां/लड़कियां/बच्चियां किस दोजख से गुजरती हैं इसकी खबर कौन लेना चाहेगा भला? छेड़खानी, बदतमीजी, अश्लीलता, बलात्कार, शारीरिक-मानसिक हिंसा, और अस्तित्वहीनता से भरे दोजख में कैसे हम जिंदा हैं इसकी किसे पड़ी है ? फिर भी सुनिए तो सही, आपकी शर्मिंदगी की हमें उम्मीद नहीं....क्योंकि शर्मिंदगी के साथ जन्नत नहीं पनप सकती। लेकिन जिस चीज को बाजार का वरदहस्त प्राप्त हो वह तो कब्र से भी जीवित लौट सकती है। औरतें बाजार को अपने जीवन के पक्ष में भी खड़ा नहीं कर सकी...पुरुषों ने बाजार को अपने स्वर्ग के हक में खड़ा कर लिया....! सच में कुछ चीजों में अभी भी स्त्रियां पुरुषों की बराबरी नहीं कर सकी। ठीक है कि हमारे यहां लॉस वेगास नहीं है। लेकिन आधी आबादी की जरुरत के मद्देनजर हमारे यहां छोटे-बड़े लॉस वेगास तो हैं ही, जिन्हें हम नफीस भाषा में रेड लाइट एरिया कहते हैं। कोठे और वेश्या शब्द बोलने में तो हमें अपनी जबान के गंदा होने का अहसास होता है, लेकिन उनमें रह रही वेश्याएं हमारी मूलभूत जरुरतों में शामिल हैं....! यदि ऐसा न होता तो देश-दुनिया का कोई तो दौर होता जहां वेश्यालयों की संस्कृति न होती। ऐसे ही हैं हम....पर ऐसे कैसे हैं हम....?
सेंटर फॉर सोशल रिसर्च की निदेशक डा० रंजना के अनुसार देश में लगभग ३० लाख से ज्यादा महिलाएं और लड़कियां अपनी इच्छा के खिलाफ देह व्यापार का काम कर रही हैं।...और हर साल लगभग दो लाख से ज्यादा लड़कियों/स्त्रियों को जबरन या धोखे से इस धंधे में उतार दिया जाता है। पुरुषां के इस स्वर्ग के लिए लड़कियों की तस्करी भी होती है, जिसमें लगभग ६० प्रतिशत की उम्र १८ साल से कम होती है! सिर्फ कुछ लाख लड़कियों और स्त्रियों के दोज+खमय जीवन से यदि करोड़ों लोगों को स्वर्ग और जन्नत नसीब होती हो तो क्या हमें इस दोजख को स्वीकार करते नहीं चले जाना चाहिए ? सर्वजन सुखाय न सही अधिकांश के सुख के लिए तो हमें अपनी आहूति देनी ही चाहिए...........नहीं ?
लेकिन एक शिकायत है हमें इन स्वार्गिक आनंद लेने वालों से। ये दोगले हैं। एक तरफ अपने-अपने एकांत में फिल्मों, वेबसाइटों, चैनलों, एम.एम.एस, आदि के जरिए हमारी निर्वस्त्र देहों का पान करते है; दूसरी तरफ अपनी बहन, बेटी, पत्नी, दोस्त या पे्रयसी के छिड़ने या बलात्कार होने पर स्यापे में शामिल भी होते हैं। जो लोग अपनी नैतिक मर्यादाओं या सामाजिक भय से कोठों पर नही जा पाते या अन्य तरीकों तक नहीं पहुच पाते या पहुच पाने के बाद भी जिन्हें संतुष्टि नहीं होती वे कहॉं जाएंगे उस स्वर्गानुभूति के लिए? वे रेल, बस, सड़क, दुकान, ऑफिस, मेले, बाजार में घूमती लड़कियों से ही न काम चलाएंगे। एक तरफ आप एकांत में मादा देहों की कामना भी करेंगे और दूसरी तरफ अपनी स्त्रियों के बलात्कृत होने या छेड़े जाने पर शोर भी मचाएंगे....यह भला कहां की नैतिकता है ? जब तक आप अपने घर से बाहर की स्त्रियों को अपने जन्नत का साधन समझते रहेंगे, तब तक आप दूसरों को ऐसा करने से कैसे रोकेगें...? ऐसे में पुलिस, प्रशासन और सरकार को कोसा जाता है कि वे लड़कियों की सुरक्षा क्यों नहीं कर पा रहे हैं ? लेकिन पहली बात तो यह कि पुलिस, प्रशासन और सरकार की आबादी और ताकत आपकी आधी आबादी से कहीं कम है। आम जनता का बड़ा तबका जो दिल से करना चाहेगा कर पाएगा (और कर रहा है)। दूसरा, पुलिस, प्रशासन, और सरकार आसमान से नहीं टपके। हमारे ही घरों से निकलकर कुर्सियां संभाली हैं इन्होंने । ये भी उसी हाड़-मांस से बने है जिससे आप। आप खुद को बेलगाम रखना चाहते हैं तो फिर दूसरों को बेलगाम होने से भला केसे रोक सकते हैं ? इन तथाकथित सुरक्षाकर्मियों को भी निर्वस्त्र बालाओं या स्त्री देह में वैसी ही जन्नत दिखती है जैसी आपको। ये भी स्त्री को देह से अलग कुछ नहीं समझ पाते आप ही कि तरह....अभी हाल ही में एनसीआर के रेलवे स्टेशनों व रेलों में महिलाओं के साथ बढ़ती छेड़छाड़ को रोकने के लिए रेलवे मंत्रालय ने एक दस सदस्यीय टीम का गठन किया है। लेकिन आप चिंता न करे, ये क्या, ऐसी लाख टीमें भी मिलकर आपको जन्नत के झरोखे में झांकने से नहीं रोक पाएंगी.... आपके छेड़खानी के हक को नहीं छीन पाएंगी ! सारा बाजार, मीडिया, फिल्म, विज्ञापन मिलकर हर पल, हर जगह एक सेक्समय माहौल बनाने में दिन-रात जुटे हैं। जिससे हर पल एक नग्न मादा जिस्म हमारे दिमाग मे हावी रहता है। सोते-जगते, सपने में, हकीकत में हम सिर्फ उसी निर्वस्त्र जन्नत में कम या ज्यादा गोते लगाते रहते हैं। अपने ही जैसे हाड़-मांस, दिल-दिमाग वाले व्यक्ति के सिर्फ ÷मांस के लोथड़े÷ में बदल जाने का दुख आप नहीं समझ पाएंगे। जन्नत से बाहर निकलेंगे तो ही न किसी के दोजख को देख पाएंगे....हम जानते है अभी तो हिंसा और अस्तीत्वहीनता से भरा हमारा दोज+ख और लंबा होगा हर पल.....क्योंकि पितृसता ने बाजार को अपने हक में पटा लिया है....इस दोजख में जीते जाने के लिए इतनी भी उम्मीद काफी है - जो रोंदी गई सदा से, एक दिन वही मिट्टी मीनार बनती है।
(लेखिका जे.एन.यू. में शोधार्थी व स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
अता-पता कमरा न०-१० साबरमती हॉस्टल, जे.एन.यू.नई दिल्ली ९३५००१९५९५, ०९३०२३९५५२०
Tuesday, June 9, 2009
ब्यूटीमिथ का सच
सौभाग्य से प्रगतिशील लेखक संघ की एक गोष्ठी में जाने का मौका मिला। नामवर सिंह की अध्यक्षता वाली इस गोष्ठी में हिंदी साहित्य के कईं विद्वान मौजूद थे। गोष्ठी संभवतः साहित्य में स्त्री मुक्ति विषय पर थी। अध्यक्षीय भाषण के बाद जुहैर रिजवी ने धन्यवाद ज्ञापन में कईं बातों के साथ एक पहले से स्थापित बात का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा - औरत इस कायनात की सबसे खूबसूरत जीच है। राजकिशोर भी - स्त्रीत्व का उत्सव÷ लिखने की श्रुआत कुछ ऐसे करते हैं -पृथ्वी की सुंदरतम सृष्टि स्त्री है। ...और भी असंख्य बार ये जुमला सुनने को मिलता रहता है। लेकिन पता नहीं क्यों ये सुनकर मैं रीझ नहीं पाती, कि मैं उस औरत जात से हूं जो कि पृथ्वी की सुंदरतम चीज या सृष्टि है। असल में यह एक ऐसा षड़यंत्र है जो स्त्रीत्व के वैभव की आड़ में उसकी देह के वैभव की स्थापना करता
यदि स्त्री के अर्थ को देह तक सीमित न किया जाता, तो उसे पृथ्वी की सुंदरतम सृष्टि न कहा जाता। यह स्त्री देह ही है जिसके चलते पुरुषों ने उसे यह ख़िताब दिया है। यह निपट देह (दिमाग नहीं), ही तो है जो पुरुष को जिंदगी भर उत्तेजित करती और उत्तेजना को शांत करती जाती है। यदि यह (देह के खेल का) ÷अनवरत सिलसिला÷ स्त्री से न जुड़ा होता, तो अपने असली रुप में वह सृष्टि की सुंदरतम चीज नहीं लगती.....! तब सबसे सुंदर चीज बच्चा भी लग सकती थी, लिंग, जाति, धर्म, वर्ण, नस्ल के तमाम भेदों से परे। आखिर सौंदर्य का यह बोध हर बार और बार-बार पुरुषों को ही क्यों होता है ? ज्यादातर किसी औरत के मुह से सुनने में नहीं आता कि ÷हम सृष्टि की सबसे सुंदर चीज हैं÷। हालांकि अभी तो स्त्रियों को सुना जाना बाकि है। सहस्त्रों सालों से तो पुरुषसत्ता ही बोलती आ रही है, अभी तो उन्हीं का मसाला खत्म नहीं हुआ।
हम जानती हैं कि सृष्टि की तरह सृजन कर सकने की क्षमता ने हमें सुंदरतम नहीं कहलवाया है....क्योंकि कम से कम अभी तक तो उस सृजन में पुरुष की भी अहम भूमिका है ही। (हालांकि विज्ञान ने पुरुष की इस भूमिका को भी चुनौती दे दी है !) स्त्री का अन्नपूर्णा रुप भी उसे सुंदरतम नहीं कहला सकता, क्योंकि सबसे बड़े जीवनदायक तो नदी, पेड़-पौधे, हवा-पानी, सूरज आदि हैैं....लेकिन ये सब सिर्फ जीवनदायक हैं....कामनापूर्ति सिर्फ स्त्री के पहलू में ही होती है (कामनापूर्ति के अन्य आधुनिक वैकल्पिक स्रोतों के बावजूद बड़ा सच यही है।)....और इतने आधुनिक तो शायद हम कभी नहीं हो पाएंगे कि देह से तटस्थ होकर सिर्फ दिमाग के कारण ही स्त्री को सुंदर कह दें। असल में स्त्री को ÷सुंदरतम÷ कहलवाने के पीछे पुरुष की उस ÷उत्तेजना का सबसे बड़ा हाथ है जो अपने चरम क्षणों में उसे मोक्ष/मुक्ति/अपार शांति की अनुभूति देती है ! वर्ना इतनी बड़ी कायनात में एक स्त्री की क्या औकात है ? जैसे समाज ने स्त्री को बनाया है (स्वैच्छिक रुप में गढ़ा है), वैसे ही मुझे लगता है कि पुरुष को भी गढ़ा गया है। अपने नैसर्गिक रुप में शायद पुरुष भी ÷उपनिवेशवादी प्रवृत्ति÷ का और इतना कामुक न हो। संभवतः ये अनंत उच्चश्रृंखलता उसे प्रकृति से नहीं सामाजिक विरासत से मिली हो। क्योंकि जिस भी पुरुष ने समाज की चली आ रही तथाकथित विरासत, संस्कार और तर्कविहीन मूल्यों का विरोध किया है, उन पुरुषों की (स्त्रियों के बारे में) सोच और व्यवहार उपनिवेशवादी नहीं बच पाया है।....बावजूद इसके कि वे भी इसी सड़े-गले समाज में पले-बड़े हैं। जो महाबौद्धिक, महाज्ञानी, रचनात्मक, विवेकवान पुरुष स्त्री को सृष्टि की सुंदरतम रचना कहते हैं, उन्हें लगे हाथ अपनी स्त्री पक्षधरता झाड़ते हुए दूसरों पर यह आरोप नहीं लगाना चाहिए कि ÷स्त्री का अर्थ दैहिक सौंदर्य और कोमल वाणी तक ही सीमित कर दिया गया है÷। क्यांेंकि असल में सृष्टि की सुंदरतम रचना स्त्री को कहने के पीछे भी असल में स्त्री के दैहिक सौंदर्य की अटूट उपासना का ही भाव है ....आखिर स्त्री का अर्थ देह और कोमलता गढ़ा किसने है ? कम से कम हम स्त्रियों ने तो नहीं ही गढ़ा। इस अपार वैभवशाली सृष्टि से सुंदर कोई चीज है भला ? असल में स्त्री को सिर्फ देह कहने-समझने वालों से ज्यादा हमें उन बौद्धिक षड़यंत्रकारियों से सावधान रहने की जरुरत है, जो एक तरफ तो स्त्री को सिर्फ देह कहने-समझने वालों पर गुर्राते हैं, दूसरी तरफ सुंदरतम चीज के नाम पर उसे मनचाहा गढ़ते, रचते, वर्णित करते हैं। ये बौद्धिक खुद चाहे लाख उस ÷सुंदरतम÷ के बखान में पूरा साहित्य लिख दें, चित्रकारी कर दें, लेकिन औरत को सीधें-सीधे सिर्फ देह कहने-समझने वालों पर आपत्ति दर्ज करते हैं। हम स्त्रियों को भी बजाए इस लुभावने कांप्लिमेंट पर रीझने के, इस ÷बुश प्रवृत्ति÷ के प्रति सचेत होना चाहिए। वही बुश प्रवृत्ति जो खुद को तो असंख्य परमाणु बम बनाकर श्रेष्ठ घोषित करती है, लेकिन दूसरे के एक भी परमाणु बम बनाने या रखने पर हाय-तौबा करती है। हमें यह समझना जरुरी है कि हमारी देह के प्र्रति अनंत आसक्ति ने ही उन लोगों के मुह से हमें सुंदरतम कहलवाया है। पूरी सृष्टि में स्त्री सुंदरतम कैसे हो सकती है और किन चीजों की तुलना में........? तुलना तो दो भिन्न परिस्थितियों में पले-बढ़ स्त्री-पुरुषों या बच्चों की भी नहीं हो सकती.....। स्त्रियों को सिर्फ देह समझने पर खोखली आपत्ति दर्ज करने वाले ये बौद्धिक षडयंत्रकारी कैसे भूल जाते हैं कि इसी सुंदरतम कृति के सौंदर्य वर्णन में उन्होंने हर जगह सिर्फ उन्नत वक्ष, पतली कमर, और विशाल नितंबों का ही वर्णन और चित्रण किया है....फिर चाहे वह हमारा साहित्य हो, चित्रकला हो या मंदिरों और गुफाओं में बनाई गई मूूर्तिकला ! स्त्री मूर्तियों के चेहरे और खोपरे में इतनी मिट्टी, पत्थर, गारा, सीमेंट कभी नहीं भरा गया, जितना कि उनके अगले-पिछले उभारों में ! स्त्रियों के रेखांकित चित्रों या वर्णित साहित्य में भी सिर और चेहरे में रंग या कलम की स्याही उतनी खर्च नहीं की गई जितनी के उसके उभारों को दर्शाने में....! यही है ना हमारे सुुंदरतम होने का सारा राज.......! ÷सुंदरतम÷ का यह सौंदर्यशास्त्र नवयुवतियों को ज+हन में रखकर गढ़ा गया होगा, चालीस-पचास पार की स्त्रियां तो उस फ्र्रेम से बाहर ही होंगी। हमने बस में देखा है कि किसी बच्चे वाली या जरुरतमंद महिला के लिए कोई लड़का सीट आसानी से नहीं छोड़ता/छोड़ना चाहता। लेकिन किसी नवयुवती का बगल में खड़े रहना उसी लड़के को बेहद अखरता है और वह बिना मांगे भी सीट देने को लालायित रहता है। जिस दुनिया और समाज के पुरुषों को अपनी हर बात, सारे निर्णय सबसे ज्यादा सही, साहसी और सृजनशील लगते हैं, उन पुरुषों की औकात अभी इतनी नहीं है कि वे स्त्री को उसके ÷स्त्रीत्व के वैभव÷ के कारण सुंदरतम की पदवी दे सकें ! वह असल में ÷देह का वैभव÷ है जो हमें सुंदरतम कहलवाता है न कि हमारे ÷स्त्रीत्व का वैभव÷। और इस देह के वैभव का उत्सव भी पुरुषों ने ही मनाया है अभी तक हम स्त्रियों ने नहीं ! हमने तो बाज+ार के आक्रामक रुप में प्रकट होने के बाद जाना कि स्त्रियां भी अपनी देह का वैभव मना सकती हैं। स्त्रीत्व के वैभव में तो उसकी तमाम बौद्धिक, शारीरिक कुशलताएं, हुनर, प्रबंधन, सुजनशीलता(जो कि सिर्फ मॉं बनना नहीं है), ममत्व, स्नेह, ताकत और भी न जाने कितना कुछ आता है। पितृसत्ता के चंगुल से जो निकल चुके हैं, उन पुरुषों को नहीं कहती, लेकिन पितृसत्ता की चाशनी में पोर-पोर डूबे पुरुषों में अभी इतनी हिम्मत नहीं है कि वे इन तमाम गुणों के चलते स्त्री को पूरी कायनात में किसी मामले में सबसे ऊपर, पुरुषों से भी ऊपर रख सकें और उसे सुंदर कह सकें। स्त्री को सुंदरतम कहने वाले क्या बताएंगे कि खुरदुरे हाथों, मजबूत कंधों, बलिष्ठ भुजाओं, फटी ऐडियों वाली सांवली-सलौनी किसानिने और मजदूरिनें भी क्या कभी उनके सौंदर्यशास्त्र में शामिल हुई हैं...? और हुई हैं तो कितनी बार.....? क्या हम स्त्रियों का श्रम, दिमाग, प्रबंधन, ताकत हमें सुंदरतम कहलवाने में सच में शामिल है ? श्रेष्ठ कवयित्री निर्मला पुतुल कि कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं -
÷÷वे दबे पांव आते हैं तुम्हारी संस्कृति में वे तुम्हारे नृत्य की बड़ाई करते हैंवे तुम्हारी आखों की प्रशंसा में कसीदे पढ़ते है, वे कौन हैं......?सौदागर हैं वे....समझो...पहचानांें उन्हें बिटिया मुर्मू.....पहचानो...÷÷
लेखिका जे.एन.यू. में शोधार्थी एवं स्वतत्र टिप्पणीकार हैं।
कमरा न० १०, साबरमती हास्टलजे.एन.यू., नई दिल्ली।९३५००१९५९५
यदि स्त्री के अर्थ को देह तक सीमित न किया जाता, तो उसे पृथ्वी की सुंदरतम सृष्टि न कहा जाता। यह स्त्री देह ही है जिसके चलते पुरुषों ने उसे यह ख़िताब दिया है। यह निपट देह (दिमाग नहीं), ही तो है जो पुरुष को जिंदगी भर उत्तेजित करती और उत्तेजना को शांत करती जाती है। यदि यह (देह के खेल का) ÷अनवरत सिलसिला÷ स्त्री से न जुड़ा होता, तो अपने असली रुप में वह सृष्टि की सुंदरतम चीज नहीं लगती.....! तब सबसे सुंदर चीज बच्चा भी लग सकती थी, लिंग, जाति, धर्म, वर्ण, नस्ल के तमाम भेदों से परे। आखिर सौंदर्य का यह बोध हर बार और बार-बार पुरुषों को ही क्यों होता है ? ज्यादातर किसी औरत के मुह से सुनने में नहीं आता कि ÷हम सृष्टि की सबसे सुंदर चीज हैं÷। हालांकि अभी तो स्त्रियों को सुना जाना बाकि है। सहस्त्रों सालों से तो पुरुषसत्ता ही बोलती आ रही है, अभी तो उन्हीं का मसाला खत्म नहीं हुआ।
हम जानती हैं कि सृष्टि की तरह सृजन कर सकने की क्षमता ने हमें सुंदरतम नहीं कहलवाया है....क्योंकि कम से कम अभी तक तो उस सृजन में पुरुष की भी अहम भूमिका है ही। (हालांकि विज्ञान ने पुरुष की इस भूमिका को भी चुनौती दे दी है !) स्त्री का अन्नपूर्णा रुप भी उसे सुंदरतम नहीं कहला सकता, क्योंकि सबसे बड़े जीवनदायक तो नदी, पेड़-पौधे, हवा-पानी, सूरज आदि हैैं....लेकिन ये सब सिर्फ जीवनदायक हैं....कामनापूर्ति सिर्फ स्त्री के पहलू में ही होती है (कामनापूर्ति के अन्य आधुनिक वैकल्पिक स्रोतों के बावजूद बड़ा सच यही है।)....और इतने आधुनिक तो शायद हम कभी नहीं हो पाएंगे कि देह से तटस्थ होकर सिर्फ दिमाग के कारण ही स्त्री को सुंदर कह दें। असल में स्त्री को ÷सुंदरतम÷ कहलवाने के पीछे पुरुष की उस ÷उत्तेजना का सबसे बड़ा हाथ है जो अपने चरम क्षणों में उसे मोक्ष/मुक्ति/अपार शांति की अनुभूति देती है ! वर्ना इतनी बड़ी कायनात में एक स्त्री की क्या औकात है ? जैसे समाज ने स्त्री को बनाया है (स्वैच्छिक रुप में गढ़ा है), वैसे ही मुझे लगता है कि पुरुष को भी गढ़ा गया है। अपने नैसर्गिक रुप में शायद पुरुष भी ÷उपनिवेशवादी प्रवृत्ति÷ का और इतना कामुक न हो। संभवतः ये अनंत उच्चश्रृंखलता उसे प्रकृति से नहीं सामाजिक विरासत से मिली हो। क्योंकि जिस भी पुरुष ने समाज की चली आ रही तथाकथित विरासत, संस्कार और तर्कविहीन मूल्यों का विरोध किया है, उन पुरुषों की (स्त्रियों के बारे में) सोच और व्यवहार उपनिवेशवादी नहीं बच पाया है।....बावजूद इसके कि वे भी इसी सड़े-गले समाज में पले-बड़े हैं। जो महाबौद्धिक, महाज्ञानी, रचनात्मक, विवेकवान पुरुष स्त्री को सृष्टि की सुंदरतम रचना कहते हैं, उन्हें लगे हाथ अपनी स्त्री पक्षधरता झाड़ते हुए दूसरों पर यह आरोप नहीं लगाना चाहिए कि ÷स्त्री का अर्थ दैहिक सौंदर्य और कोमल वाणी तक ही सीमित कर दिया गया है÷। क्यांेंकि असल में सृष्टि की सुंदरतम रचना स्त्री को कहने के पीछे भी असल में स्त्री के दैहिक सौंदर्य की अटूट उपासना का ही भाव है ....आखिर स्त्री का अर्थ देह और कोमलता गढ़ा किसने है ? कम से कम हम स्त्रियों ने तो नहीं ही गढ़ा। इस अपार वैभवशाली सृष्टि से सुंदर कोई चीज है भला ? असल में स्त्री को सिर्फ देह कहने-समझने वालों से ज्यादा हमें उन बौद्धिक षड़यंत्रकारियों से सावधान रहने की जरुरत है, जो एक तरफ तो स्त्री को सिर्फ देह कहने-समझने वालों पर गुर्राते हैं, दूसरी तरफ सुंदरतम चीज के नाम पर उसे मनचाहा गढ़ते, रचते, वर्णित करते हैं। ये बौद्धिक खुद चाहे लाख उस ÷सुंदरतम÷ के बखान में पूरा साहित्य लिख दें, चित्रकारी कर दें, लेकिन औरत को सीधें-सीधे सिर्फ देह कहने-समझने वालों पर आपत्ति दर्ज करते हैं। हम स्त्रियों को भी बजाए इस लुभावने कांप्लिमेंट पर रीझने के, इस ÷बुश प्रवृत्ति÷ के प्रति सचेत होना चाहिए। वही बुश प्रवृत्ति जो खुद को तो असंख्य परमाणु बम बनाकर श्रेष्ठ घोषित करती है, लेकिन दूसरे के एक भी परमाणु बम बनाने या रखने पर हाय-तौबा करती है। हमें यह समझना जरुरी है कि हमारी देह के प्र्रति अनंत आसक्ति ने ही उन लोगों के मुह से हमें सुंदरतम कहलवाया है। पूरी सृष्टि में स्त्री सुंदरतम कैसे हो सकती है और किन चीजों की तुलना में........? तुलना तो दो भिन्न परिस्थितियों में पले-बढ़ स्त्री-पुरुषों या बच्चों की भी नहीं हो सकती.....। स्त्रियों को सिर्फ देह समझने पर खोखली आपत्ति दर्ज करने वाले ये बौद्धिक षडयंत्रकारी कैसे भूल जाते हैं कि इसी सुंदरतम कृति के सौंदर्य वर्णन में उन्होंने हर जगह सिर्फ उन्नत वक्ष, पतली कमर, और विशाल नितंबों का ही वर्णन और चित्रण किया है....फिर चाहे वह हमारा साहित्य हो, चित्रकला हो या मंदिरों और गुफाओं में बनाई गई मूूर्तिकला ! स्त्री मूर्तियों के चेहरे और खोपरे में इतनी मिट्टी, पत्थर, गारा, सीमेंट कभी नहीं भरा गया, जितना कि उनके अगले-पिछले उभारों में ! स्त्रियों के रेखांकित चित्रों या वर्णित साहित्य में भी सिर और चेहरे में रंग या कलम की स्याही उतनी खर्च नहीं की गई जितनी के उसके उभारों को दर्शाने में....! यही है ना हमारे सुुंदरतम होने का सारा राज.......! ÷सुंदरतम÷ का यह सौंदर्यशास्त्र नवयुवतियों को ज+हन में रखकर गढ़ा गया होगा, चालीस-पचास पार की स्त्रियां तो उस फ्र्रेम से बाहर ही होंगी। हमने बस में देखा है कि किसी बच्चे वाली या जरुरतमंद महिला के लिए कोई लड़का सीट आसानी से नहीं छोड़ता/छोड़ना चाहता। लेकिन किसी नवयुवती का बगल में खड़े रहना उसी लड़के को बेहद अखरता है और वह बिना मांगे भी सीट देने को लालायित रहता है। जिस दुनिया और समाज के पुरुषों को अपनी हर बात, सारे निर्णय सबसे ज्यादा सही, साहसी और सृजनशील लगते हैं, उन पुरुषों की औकात अभी इतनी नहीं है कि वे स्त्री को उसके ÷स्त्रीत्व के वैभव÷ के कारण सुंदरतम की पदवी दे सकें ! वह असल में ÷देह का वैभव÷ है जो हमें सुंदरतम कहलवाता है न कि हमारे ÷स्त्रीत्व का वैभव÷। और इस देह के वैभव का उत्सव भी पुरुषों ने ही मनाया है अभी तक हम स्त्रियों ने नहीं ! हमने तो बाज+ार के आक्रामक रुप में प्रकट होने के बाद जाना कि स्त्रियां भी अपनी देह का वैभव मना सकती हैं। स्त्रीत्व के वैभव में तो उसकी तमाम बौद्धिक, शारीरिक कुशलताएं, हुनर, प्रबंधन, सुजनशीलता(जो कि सिर्फ मॉं बनना नहीं है), ममत्व, स्नेह, ताकत और भी न जाने कितना कुछ आता है। पितृसत्ता के चंगुल से जो निकल चुके हैं, उन पुरुषों को नहीं कहती, लेकिन पितृसत्ता की चाशनी में पोर-पोर डूबे पुरुषों में अभी इतनी हिम्मत नहीं है कि वे इन तमाम गुणों के चलते स्त्री को पूरी कायनात में किसी मामले में सबसे ऊपर, पुरुषों से भी ऊपर रख सकें और उसे सुंदर कह सकें। स्त्री को सुंदरतम कहने वाले क्या बताएंगे कि खुरदुरे हाथों, मजबूत कंधों, बलिष्ठ भुजाओं, फटी ऐडियों वाली सांवली-सलौनी किसानिने और मजदूरिनें भी क्या कभी उनके सौंदर्यशास्त्र में शामिल हुई हैं...? और हुई हैं तो कितनी बार.....? क्या हम स्त्रियों का श्रम, दिमाग, प्रबंधन, ताकत हमें सुंदरतम कहलवाने में सच में शामिल है ? श्रेष्ठ कवयित्री निर्मला पुतुल कि कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं -
÷÷वे दबे पांव आते हैं तुम्हारी संस्कृति में वे तुम्हारे नृत्य की बड़ाई करते हैंवे तुम्हारी आखों की प्रशंसा में कसीदे पढ़ते है, वे कौन हैं......?सौदागर हैं वे....समझो...पहचानांें उन्हें बिटिया मुर्मू.....पहचानो...÷÷
लेखिका जे.एन.यू. में शोधार्थी एवं स्वतत्र टिप्पणीकार हैं।
कमरा न० १०, साबरमती हास्टलजे.एन.यू., नई दिल्ली।९३५००१९५९५
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